शनिवार, 24 जनवरी 2026

कैसे एक चींटी ने उठाया एक विशाल पहाड़ को जानिए क्या हुआ आखरी मोड़ में

 नन्ही चींटी और शक्कर का पहाड़: हार के आगे जीत है (प्रेरणादायक कहानी)

कैसे एक चींटी ने उठाया एक विशाल पहाड़ को जानिए क्या हुआ आखरी मोड़ में


 एक छोटा सा संसार

किसी पुराने शहर के एक बड़े से बंगले के रसोईघर के पीछे एक छोटी सी दुनिया बस्ती थी। यह दुनिया थी चींटियों की। यहाँ हज़ारों चींटियाँ रहती थीं, जो दिन-रात बस भोजन की तलाश में जुटी रहती थीं। इसी झुंड में एक छोटी सी चींटी थी जिसका नाम था 'नन्ही'। नन्ही कद में तो सबसे छोटी थी, लेकिन उसके सपने और उसका हौसला उस रसोई की छत से भी ऊँचा था।

जहाँ बाकी चींटियाँ छोटे-छोटे कणों से खुश हो जाती थीं, नन्ही हमेशा कुछ बड़ा करने की सोचती थी। वह अक्सर कहती, "एक दिन मैं अपने पूरे कुनबे के लिए इतना भोजन लाऊँगी कि किसी को भी हफ़्तों तक बाहर नहीं निकलना पड़ेगा।" दूसरी चींटियाँ उस पर हँसती थीं।

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वह सुनहरा अवसर

एक दोपहर, जब रसोईघर में सन्नाटा था, नन्ही टहलते हुए डाइनिंग टेबल के नीचे पहुँची। वहाँ उसकी नज़र एक चीज़ पर पड़ी जिसे देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। फर्श के एक कोने में शक्कर का एक बहुत बड़ा डला (टुकड़ा) पड़ा था। वह कोई साधारण शक्कर का दाना नहीं था, बल्कि नन्ही के लिए वह 'शक्कर का पहाड़' था।

नन्ही ने तुरंत हिसाब लगाया। अगर वह इसे अपने बिल तक ले जाए, तो उसकी पूरी कॉलोनी के लिए महीनों का राशन जमा हो जाएगा। लेकिन एक समस्या थी—वह टुकड़ा नन्ही के आकार से लगभग 50 गुना बड़ा और भारी था।

संघर्ष की शुरुआत

नन्ही उस पहाड़ के पास पहुँची और अपने नन्हे पैरों से उसे धकेलने की कोशिश की। उसने अपनी पूरी जान लगा दी, उसका शरीर पसीने से तर-बतर हो गया, लेकिन शक्कर का वह टुकड़ा टस से मस नहीं हुआ। वह बार-बार उसे उठाने की कोशिश करती और बार-बार गिर जाती।

तभी वहाँ से कुछ दूसरी चींटियाँ गुज़रीं। उन्होंने नन्ही को पसीना बहाते देखा तो रुक गईं। एक बड़ी चींटी ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "अरे ओ नन्ही! क्यों अपनी जान सुखा रही है? यह तेरे बस का नहीं है। चल, कोई छोटा दाना ढूँढ और घर चल।" नन्ही ने सिर उठाकर जवाब दिया, "कोशिश करने में क्या बुराई है? अगर मैं इसे हिला सकती हूँ, तो मैं इसे ले भी जा सकती हूँ।"

पहली बड़ी बाधा

नन्ही ने हिम्मत नहीं हारी। उसने एक तकनीक सोची—उसे उठाना नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खिसकाना है। वह शक्कर के पीछे गई और अपनी पूरी पीठ लगाकर धक्का दिया। एक इंच... दो इंच... पहाड़ हिलने लगा! नन्ही की खुशी का ठिकाना नहीं था।

लेकिन तभी मुसीबत आ गई। रसोई की खिड़की खुली थी और अचानक ज़ोर की हवा चली। उस हवा के झोंके ने नन्ही को उड़ाकर दूर फेंक दिया। वह एक पानी की बूंद में जा गिरी। उसके लिए वह छोटी सी बूंद एक समंदर जैसी थी। वह डूबने लगी, उसके पैर जवाब देने लगे। उसे लगा आज अंत निश्चित है।

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अंदर की आवाज़

जब नन्ही डूब रही थी, उसे अपने पिता की बात याद आई— "मुसीबत कितनी भी बड़ी हो, तब तक मत रुको जब तक तुम्हारी साँसें चल रही हैं।" नन्ही ने पूरी ताकत बटोरी और तैरकर बूंद से बाहर निकल आई। वह थक चुकी थी, गीली थी और डरी हुई थी। लेकिन उसकी नज़र फिर भी उस शक्कर के टुकड़े पर थी।

वह फिर से उठी। इस बार वह और भी ज़्यादा सावधान थी। वह वापस शक्कर के पास पहुँची। इस बार उसने देखा कि रास्ते में एक दरार है। अगर वह शक्कर को सीधे ले जाती, तो वह दरार में गिर जाती।

बुद्धि और मेहनत का संगम

नन्ही ने रास्ता बदला। वह शक्कर को टेढ़ा-मेढ़ा घुमाकर ले जाने लगी। उसका रास्ता लंबा हो गया था, लेकिन सुरक्षित था। रास्ते में उसे एक मकड़ी मिली। मकड़ी ने कहा, "नन्ही, इतनी मेहनत क्यों? मेरे जाल में कुछ मक्खियाँ फँसी हैं, आधा तुम रख लो, आधा मैं।"

नन्ही ने मुस्कुराकर कहा, "धन्यवाद! पर मुझे दूसरों के जाल में फँसा हुआ नहीं, अपनी मेहनत से कमाया हुआ पहाड़ चाहिए।"

मंज़िल के करीब

सूरज ढलने वाला था। नन्ही का शरीर दर्द से कराह रहा था। उसके पैरों में छाले पड़ गए थे। वह अपने बिल से बस कुछ ही फीट दूर थी। तभी उसने देखा कि उसकी कॉलोनी की हज़ारों चींटियाँ बाहर खड़ी उसे देख रही हैं। जो पहले मज़ाक उड़ा रही थीं, आज उनकी आँखों में नन्ही के लिए सम्मान था।

कैसे एक चींटी ने उठाया एक विशाल पहाड़ को जानिए क्या हुआ आखरी मोड़ में


नन्ही ने आखिरी धक्का लगाया और वह शक्कर का पहाड़ बिल के मुहाने तक पहुँच गया। हज़ारों चींटियों ने एक साथ मिलकर 'नन्ही' के नाम के नारे लगाए। उस रात पूरी कॉलोनी ने जश्न मनाया।

कहानी की सीख (Moral of the Story)

इस कहानी से हमें यह सीखने को मिलता है कि दुनिया में कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, और कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता। अगर आपके अंदर "नन्ही" जैसा अटूट विश्वास और हार न मानने वाला जज़्बा है, तो आप पहाड़ को भी हिला सकते हैं।

लोग आप पर हँसेंगे, रास्ते में हवा के झोंके जैसी मुसीबतें आएँगी, और कभी-कभी आप अकेले पड़ जाएंगे। लेकिन याद रखिये, जीत उसी की होती है जो आखिरी सांस तक शक्कर के उस पहाड़ को छोड़ता नहीं है।

दोस्तों, यह कहानी आपको कैसी लगी? कमेंट में ज़रूर बताएं 





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