शून्य से शिखर तक: एक गरीब लड़के की भावुक और प्रेरणादायक कहानी | Motivational Story
शून्य से शिखर तक: अंधकार में जलता दीपक भाग 1: धुंधली सुबह सुबह के चार बज रहे थे। राजनगर की संकरी गलियाँ अभी भी कोहरे में डूबी हुई थीं। सड़क के किनारे एक जर्जर झोपड़ी में, अरविंद की आँखें खुल गईं। बिना अलार्म के, बिना किसी आवाज़ के—मानो उसके शरीर में कोई आंतरिक घड़ी हो जो उसे हर दिन इस समय जगा देती थी। चारों ओर अंधेरा था, लेकिन उसे अपनी झोपड़ी का हर कोना याद था। टपकती छत, गीली दीवारें, और कोने में रखी उसकी पढ़ाई की किताबें—यही उसकी दुनिया थी। अरविंद ने धीरे से अपनी चटाई से उठकर अपनी माँ की ओर देखा। सीता देवी बीमार थीं, और उनका शरीर पिछले कुछ महीनों में और भी कमजोर हो गया था। उनके चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—एक माँ की वह चमक जो अपने बच्चे के लिए कुछ भी कर सकती है। अरविंद ने उनके माथे पर हाथ रखा। बुखार थोड़ा कम था, लेकिन वह अभी भी ठीक नहीं थीं। उसने चुपचाप झोपड़ी से बाहर कदम रखा। ठंडी हवा ने उसके चेहरे को छुआ। राजनगर की इस गली में कोई स्ट्रीट लाइट नहीं थी, लेकिन अरविंद को यह रास्ता आँख बंद करके भी पता था। वह नहर के किनारे-किनारे चला, जहाँ से होकर वह हर र...