संविधान (Constitution) वह वैधानिक दस्तावेज (Legal Document) है, जिसमें शासन के उन मूलभूत सिद्धांतों का वर्णन होता है, जिसके अनुरूप किसी भी देश या राज्य के शासन का संचालन किया जाता है। यह किसी भी देश के संविधान से शासन के मूलभूत आदर्शों का संकेत मिलता है।
साथ ही, यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार के विभिन्न अंग किस प्रकार कार्य करेंगे तथा उनके बीच किस प्रकार का अंतर्संबंध व शक्ति संतुलन होगा। संविधान सरकार के साथ जनता के संबंधों का भी निर्धारण करता है। इसके द्वारा राजनीतिक व्यवस्था का वह बुनियादी ढाँचा भी निर्धारित होता है, जिसके अंतर्गत जनता शासित होती है।
संविधान में निहित दर्शन यह निर्धारित करता है कि वह किस प्रकार की सरकार है। संविधान संबंधित राष्ट्र के शासन के दर्शन की रूपरेखा तैयार करता है।
संविधान को देश की आधारभूत विधि (Fundamental Law) भी कहा जा सकता है, जो जनता के विश्वास व उनकी आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करती है। संविधान, जहाँ संबद्ध देश के नागरिकों के लिए कुछ अधिकार सुनिश्चित करता है, वहीं उनके कर्तव्यों को भी परिभाषित करता है।
📜 संवैधानिक विकास का वर्गीकरण (Classification)
भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का निर्माण किसी निश्चित समय पर नहीं हुआ, बल्कि यह क्रमिक विकास का परिणाम है, जो ब्रिटिश शासन के दौरान धीरे-धीरे हुआ। भारत के संवैधानिक विकास को दो भागों में विभाजित कर सकते हैं:
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अंतर्गत (1773 - 1853)
ब्रिटिश क्राउन (ताज) के शासन के अंतर्गत (1858 - 1947)
भाग 1: ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतर्गत संवैधानिक विकास (1773 - 1853)
भारत में ब्रिटिश 1600 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में व्यापार करने आए। महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम (Queen Elizabeth I) के चार्टर द्वारा उन्हें भारत में व्यापार करने के विस्तृत अधिकार प्राप्त थे। कंपनी जिसके कार्य अभी तक मात्र व्यापारिक उद्देश्यों तक ही सीमित थे, उसने 1765 ई. में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (अर्थात् राजस्व एवं दीवानी न्याय के अधिकार) प्राप्त कर ली। इसके साथ ही भारत में कंपनी की क्षेत्रीय शक्ति बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।
जिस समय तक (1858 ई.) ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन रहा, ब्रिटेन की संसद विभिन्न अवसरों पर अनेक कानून अथवा आदेश-पत्र (Company's Charter) जारी करके कंपनी के शासन पर नियंत्रण रखती रही। इन्हीं कानूनों ने धीरे-धीरे भारत में संवैधानिक विकास की पृष्ठभूमि तैयार की।
1. 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट (Regulating Act- 1773)
1773 ई. का रेगुलेटिंग एक्ट भारत के संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस अधिनियम के माध्यम से भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी पर ब्रिटिश संसदीय नियंत्रण स्थापित करने का प्रथम प्रयास किया गया।
मुख्य प्रावधान:
तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री: लॉर्ड नॉर्थ द्वारा गुप्त समिति (Secret Committee) की सिफारिश पर 1773 ई. में पारित एक्ट को रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 की संज्ञा दी गई।
संसदीय नियंत्रण: इस अधिनियम के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि, भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों का शासन मात्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों का निजी मामला नहीं माना जा सकता है। ब्रिटिश संसद को इस संदर्भ में आवश्यक कानून बनाने और निर्देश देने का पूरा अधिकार है।
कंपनी के प्रशासन की देख-रेख हेतु इंग्लैंड में दो संस्थाएँ:
निदेशक मण्डल (Court of Directors)
हितधारकों का मण्डल (Court of Proprietors)
बंगाल के गवर्नर का पदनाम बदलना: इस अधिनियम के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'गवर्नर जनरल' कहा जाने लगा तथा उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद (Executive Council) का गठन किया गया। इसके अंतर्गत पहले गवर्नर जनरल लॉर्ड वॉरेन हेस्टिंग्स (Lord Warren Hastings) थे। इसके द्वारा मद्रास एवं बंबई के गवर्नर बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन हो गए, जबकि इससे पूर्व सभी प्रेसीडेंसियों के गवर्नर एक-दूसरे से स्वतंत्र थे।
कोलकाता में उच्चतम न्यायालय की स्थापना: इस अधिनियम के अंतर्गत 1774 ई. में कोलकाता में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे।
प्रथम मुख्य न्यायाधीश: सर एलिजा इम्पे (Sir Elijah Impey)
तीन अन्य न्यायाधीश: चैम्बर्स (Chambers), लिमेस्टर (Lemaistre) एवं हाइड (Hyde)।
निजी व्यापार एवं उपहार पर रोक: इसके तहत कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार करने एवं भारतीय लोगों से उपहार व रिश्वत लेना प्रतिबंधित कर दिया गया।
ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण: इस अधिनियम के द्वारा ब्रिटिश सरकार का कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (कंपनी की गवर्निंग बॉडी) के माध्यम से कंपनी पर नियंत्रण सशक्त हो गया। कंपनी के लिए भारत में अपने राजस्व, नागरिक और सैन्य मामलों की जानकारी ब्रिटिश सरकार को देना आवश्यक कर दिया गया।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 (Pitts India Act, 1784)
इस एक्ट को ब्रिटिश संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री विलियम पिट द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
मुख्य प्रावधान:
व्यापारिक एवं प्रशासनिक शक्तियों का पृथक्करण: इस एक्ट के माध्यम से कंपनी के व्यापारिक एवं प्रशासनिक शक्तियों एवं कार्यों को अलग-अलग कर दिया गया।
नियंत्रण मण्डल (Board of Control): व्यापारिक क्रियाकलापों को कंपनी के निदेशकों के हाथों में पहले की तरह रखते हुए, राजनीतिक क्रियाकलापों (सैनिक, असैनिक व राजस्व संबंधी) के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण हेतु इंग्लैंड में एक 6 सदस्यीय नियंत्रक-मण्डल (Board of Control) की स्थापना की गई।
प्रशासनिक निकाय: कंपनी के अधिकारों वाले क्षेत्र पहली बार 'ब्रिटिश ताज (Crown) के स्वामित्त्व के दावे का पहला वैधानिक दस्तावेज' बना।
सशक्त नियंत्रण: बोर्ड ऑफ कंट्रोल के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का भारत में कंपनी के मामलों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।
3. 1886 का अधिनियम (Act of 1786)
विशेष अधिकार: इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थितियों में अपनी परिषद के निर्णय को निरस्त करके अपने निर्णय लागू करने का अधिकार प्रदान किया गया, साथ ही गवर्नर जनरल को प्रधान सेनापति की शक्तियाँ भी प्रदान की गईं।
सर्वप्रथम किसे मिला? ये दोनों अधिकार सर्वप्रथम लॉर्ड कॉर्नवालिस को प्राप्त हुए।
4. चार्टर एक्ट, 1793 (Charter Act of 1793)
व्यापारिक एकाधिकार का विस्तार: इस अधिनियम के माध्यम से कंपनी के व्यापारिक अधिकारों को 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया तथा नियंत्रक मण्डल के सदस्यों को भारतीय राजस्व से वेतन देने की व्यवस्था की गई।
लिखित विधियों का महत्व: ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों में लिखित विधियों द्वारा प्रशासन की नींव रखी गई तथा सभी कानूनों व नियमों की व्याख्या का अधिकार न्यायालय को प्रदान किया गया।
5. चार्टर एक्ट, 1813 (Charter Act of 1813)
व्यापारिक एकाधिकार की समाप्ति: इस एक्ट के द्वारा भारत में कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करके कुछ प्रतिबंधों के साथ सभी अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने की छूट मिल गई। यद्यपि, कंपनी का चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार पर एकाधिकार बना रहा।
नियम और मंजूरी: भारतीय राजस्व से व्यय करने के लिए नियम एवं पद्धतियाँ बनाई गईं। इस चार्टर ने कोलकाता, बंबई और मद्रास की सरकारों द्वारा बनाई गई विधियों का ब्रिटिश संसद द्वारा अनुमोदन किया जाना अनिवार्य बना दिया। ब्रिटिश संसद की अनुमति के बिना ये विधियाँ लागू नहीं की जा सकती थीं।
गवर्नर जनरल की शक्ति: कंपनी को गवर्नर जनरल, गवर्नरों तथा प्रधान सेनापतियों को नियुक्त करने का अधिकार दिया गया। इसके लिए ब्रिटिश क्राउन की स्वीकृति अनिवार्य थी।
शिक्षा हेतु बजट: इस एक्ट में भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए प्रति वर्ष एक लाख रुपये की वार्षिक धनराशि के व्यय का प्रावधान किया गया। साथ ही, भारत में ईसाई मिशनरियों को धर्म प्रचार की अनुमति दी गई। इससे इन प्रदेशों पर क्राउन के प्रभुत्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
6. 1833 का चार्टर अधिनियम (Charter Act of 1833)
ब्रिटिश भारत के प्रशासनिक केंद्रीकरण की दिशा में यह अधिनियम निर्णायक कदम था। इस अधिनियम की विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-
भारत का गवर्नर जनरल: इसने बंगाल के गवर्नर जनरल को 'भारत का गवर्नर जनरल' बना दिया, जिसमें सभी नागरिक एवं सैन्य शक्तियाँ निहित थीं। इस प्रकार, इस अधिनियम ने पहली बार एक ऐसी सरकार का निर्माण किया, जिसका ब्रिटिश अधिकार वाले संपूर्ण भारतीय क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण था।
प्रथम गवर्नर जनरल: लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे।
विधायी शक्तियों का केंद्रीकरण: इसने मद्रास और बंबई के गवर्नरों को विधायिकी शक्ति से वंचित कर दिया। भारत के गवर्नर जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत में विधायिका के असीमित अधिकार प्रदान कर दिए गए। इसके अंतर्गत, पहले बनाए गए कानूनों को नियामक कानून (Regulatory Laws) कहा गया और नए कानून के तहत बने कानूनों को अधिनियम (Act) कहा गया।
कंपनी की व्यापारिक भूमिका समाप्त: ईस्ट इंडिया कंपनी की एक व्यापारिक निकाय के रूप में की जाने वाली गतिविधियों को समाप्त कर दिया गया। अब यह पूर्ण रूप से प्रशासनिक निकाय बन गई।
सिविल सेवकों के चयन का प्रयास: चार्टर एक्ट, 1833 ने सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता का आयोजन प्रारंभ करने का प्रयास किया। इसमें कहा गया कि, धर्म, वंश, रंग, जाति तथा धर्म के आधार पर कंपनी की सेवा से भारतीयों को वंचित नहीं किया जाएगा। (काले कानून धारा 87 में वर्णित)। हालांकि, कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विरोध के कारण इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया।
विधि सदस्य (Law Member): विधिक परामर्श हेतु गवर्नर जनरल की परिषद में प्रथम विधि सदस्य के रूप में लॉर्ड मैकाले को शामिल किया गया। उसने केवल परिषद की बैठकों में भाग लेने का अधिकार था, मतदान का नहीं।
विधि आयोग का गठन: विधियों के सहिंताकरण के लिए गवर्नर जनरल को आयोग गठित करने का अधिकार दिया गया। 1834 ई. में लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय विधि आयोग का गठन किया गया।
दास प्रथा की समाप्ति: इस एक्ट के द्वारा भारत में दास प्रथा को विधि विरुद्ध घोषित कर दिया गया। अंततः 1843 ई. में दास प्रथा को समाप्त कर दिया गया।
7. 1853 का चार्टर अधिनियम (Charter Act of 1853)
1793 ई. से 1853 ई. के दौरान, ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किए गए चार्टर अधिनियमों की श्रृंखला में यह अंतिम चार्टर अधिनियम था। संवैधानिक विकास की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण अधिनियम था।
विधायी व प्रशासनिक कार्य अलग: इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी कार्यों को प्रशासनिक कार्यों से पृथक करने की व्यवस्था की गई।
विधान परिषद (Legislative Council): विधि निर्माण हेतु, भारत के लिए एक अलग 12 सदस्यीय विधान परिषद (Legislative Council) की स्थापना की गई। विधान परिषद की इस शाखा ने छोटी संसद की तरह कार्य किया।
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व: गवर्नर जनरल की परिषद में छः नए सदस्यों में से चार का चुनाव बंगाल, मद्रास, बंबई और आगरा की स्थानीय प्रांतीय सरकारों द्वारा किया जाता था। विधान परिषद का प्रमुख कार्य देश के लिए विधि बनाना था किंतु, इस विधि को अधिनियम बनने के लिए गवर्नर जनरल की अनुमति आवश्यक थी। ऐसी विधियों पर गवर्नर जनरल वीटो (Veto) भी कर सकता था।
सिविल सेवकों की भर्ती: सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता का आयोजन प्रारंभ हुआ। 1854 ई. में लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में मैकाले समिति का गठन किया गया।
भाग 2: ब्रिटिश क्राउन के अंतर्गत शासन (1858 - 1947)
सन 1858 के पश्चात्, ब्रिटिश शासन के अंतर्गत भारत में किए गए सुधारों का मुख्य उद्देश्य 1857 के विद्रोह जैसी घटना की पुनरावृत्ति को रोकना तथा साथ ही एक सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था को स्थापित कर भारत का उपयोग ब्रिटिश औपनिवेशिक हित में करना था।
1. भारत शासन अधिनियम, 1858 (Government of India Act, 1858)
अधिनियम की विशेषताएँ:
शासन सीधे क्राउन के अधीन: इसके तहत भारत का शासन सीधे महारानी विक्टोरिया के अधीन चला गया। गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर 'भारत का वायसराय' कर दिया गया। वह (वायसराय) भारत में ब्रिटिश ताज का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बन गया।
प्रथम वायसराय: लॉर्ड कैनिंग (Lord Canning) भारत के प्रथम वायसराय बने।
द्वैध शासन समाप्त: इस अधिनियम ने नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) और निदेशक कोर्ट (Court of Directors) को समाप्त कर भारत में द्वैध शासन प्रणाली का अंत कर दिया।
भारत सचिव (Secretary of State for India): एक नए पद के रूप में 'भारत के राज्य सचिव' (Secretary of State of India) का सृजन किया गया, जिसमें भारतीय प्रशासन पर संपूर्ण नियंत्रण की शक्ति निहित थी। यह सचिव ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था जो ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी होता था।
भारत-परिषद (India Council): भारत सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक 'भारत-परिषद' (India Council) की स्थापना की गई। इस परिषद का मुख्य कार्य भारत सचिव को भारत के शासन के कार्य में परामर्श और सहायता देना था।
1 नवंबर 1858 की घोषणा: 1 नवंबर, 1858 को ब्रिटिश महारानी की घोषणा को भारतीय शिक्षित वर्ग ने अपने अधिकारों का मैग्नाकार्टा (Magnacarta) कहा।
2. भारत परिषद अधिनियम, 1861 (Indian Councils Act, 1861)
1861 का भारतीय परिषद अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास के इतिहास में दो कारणों से विशेष महत्व रखता है-
बंगाल के प्रशासनिक कार्यों के लिए, एक पृथक लेफ़्टिनेंट गवर्नर नियुक्त किया गया।
इस अधिनियम द्वारा गवर्नर जनरल की परिषद में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल कर उन्हें विधायी कार्यों में सहयोग करने का अधिकार प्रदान किया गया तथा गवर्नर जनरल की विधायी शक्तियों का विकेंद्रीकरण (Decentralisation) कर दिया गया।
मुख्य बिंदु:
गवर्नर जनरल की कार्यपालिका का विस्तार: प्रांतीय विधान परिषदों को विधि निर्माण का अधिकार प्रदान किया गया जिससे प्रांतीय स्वायत्तता का प्रारंभ हुआ।
विधि-विशेषज्ञ: गवर्नर-जनरल की कार्यपालिका परिषद का विस्तार करते हुए इसमें विधि-विशेषज्ञ के रूप में एक पाँचवाँ सदस्य शामिल किया गया।
गैर-सरकारी सदस्य: गवर्नर जनरल को विधि निर्माण की शक्ति प्राप्त थी। इस उद्देश्य के लिए केंद्रीय विधान मंडल में न्यूनतम 6 सदस्य तथा अधिकतम 12 सदस्य नामांकित किए जा सकते थे। इन नामांकित सदस्यों में से आधे सदस्य गैर-सरकारी होते थे।
तीन भारतीयों का नामांकन: तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने 1862 ई. में नवगठित केंद्रीय विधान परिषद में निम्नलिखित तीन भारतीयों को नियुक्त किया—
- पटियाला के महाराजा नरेंद्र सिंह
- बनारस के राजा देवनारायण सिंह
- सर दिनकर राव।
पोर्टफोलियो प्रणाली (Portfolio System): लॉर्ड कैनिंग ने विभागीय प्रणाली (Portfolio System) की शुरुआत की।
अध्यादेश जारी करने की शक्ति: गवर्नर जनरल को अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति प्रदान की गयी, जो आपातकाल में छः माह तक प्रभावी रह सकता था।
3. भारत परिषद अधिनियम, 1892 (Indian Councils Act, 1892)
सदस्यों की संख्या में वृद्धि: इसके माध्यम से केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त (गैर-सरकारी) सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई, यद्यपि बहुमत सरकारी सदस्यों का ही रहता था।
बजट पर चर्चा: केंद्रीय विधान सभा के अतिरिक्त मनोनीत सदस्यों की संख्या कम से कम 10 और अधिक से अधिक 16 निश्चित की गई। इनमें 10 सदस्यों को गैर-सरकारी होना आवश्यक था।
प्रश्न पूछने का अधिकार: विधान परिषद में गैर-सरकारी सदस्यों की कोई प्रभावी भूमिका नहीं थी। वे न तो कोई प्रश्न पूछ सकते थे और न ही बजट पर चर्चा कर सकते थे। गवर्नर जनरल केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों द्वारा पारित किसी विधेयक पर निषेधाधिकार अर्थात् वीटो (Veto) का प्रयोग कर सकता था। साथ ही, ब्रिटिश संसद किसी भी विधि को अस्वीकार कर सकती थी।
4. भारत परिषद अधिनियम, 1909 (मार्ले-मिंटो सुधार)
इस अधिनियम को मार्ले-मिंटो सुधार (Morley-Minto Reforms) के नाम से भी जाना जाता है (उस समय लॉर्ड मार्ले इंग्लैंड में भारत के राज्य सचिव थे तथा लॉर्ड मिंटो भारत में वायसराय थे)। लॉर्ड मिंटो ने इस दिन को भारतीय इतिहास की एक युगांतर घटना कहा था।
मुख्य बिंदु:
लक्ष्य: मार्ले-मिंटो सुधार का लक्ष्य भारत परिषद अधिनियम, 1892 के दोषों को दूर करना, मुस्लिम अल्पसंख्यकों को खुश करना तथा भारत में बढ़ते हुए उग्रवाद एवं क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का सामना करना था।
आकार में वृद्धि: इस अधिनियम ने केंद्रीय और प्रांतीय विधानपरिषदों के आकार में व्यापक वृद्धि की। केंद्रीय परिषद में सदस्यों की संख्या 16 से 60 हो गई।
गैर-सरकारी बहुमत: प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों के बहुमत की अनुमति थी।
बहस का दायरा बढ़ा: परिषदों के चर्चा कार्यों की परिधि को बढ़ाया, जैसे— पूरक प्रश्न पूछना, बजट पर संकल्प रखना आदि।
कार्यपालिका परिषद में प्रथम भारतीय: इस अधिनियम के अंतर्गत पहली बार किसी भारतीय का वायसराय और गवर्नर की कार्यपालिका परिषद (Executive Council) के साथ एसोसिएशन (Association) बनाने का प्रावधान किया गया। सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्यपालिका परिषद के प्रथम भारतीय सदस्य बने। उन्हें विधि सदस्य बनाया गया था।
सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व (Communal Representation): इस अधिनियम द्वारा भारत में प्रादेशिक चुनाव हेतु व्यावसायिक और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व-प्रणाली को अपनाया गया। पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया। इसके अंतर्गत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे।
सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक: लॉर्ड मिंटो को 'सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक' कहा जाता है।
5. भारत शासन अधिनियम, 1919 (मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार)
1919 ई. के अधिनियम को मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहते हैं, क्योंकि इस अधिनियम के जन्मदाता भारत सचिव लॉर्ड मॉन्टेग्यू और भारत के वायसराय चेम्सफोर्ड थे। 20 अगस्त, 1917 ई. को भारत सचिव लॉर्ड मॉन्टेग्यू ने एक घोषणा की, जिसमें भविष्य के सुधारों की ओर संकेत किया गया था।
मुख्य विशेषताएँ:
उत्तरदायी सरकार की नींव: प्रांतीय विधानमंडलों को अपनी सूचियों के विषयों पर विधि बनाने का अधिकार प्रदान किया गया।
प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy in Provinces): प्रांतों में द्वैध-शासन की स्थापना की गई। इसके लिए केंद्रीय और प्रांतीय विषयों को पृथक किया गया था। प्रांतीय विषयों को पुनः दो भागों में बाँटा गया:
आरक्षित विषय: राजस्व, न्याय, वित्त, पुलिस आदि। (इन पर शासन गवर्नर अपनी परिषद के सदस्यों की सलाह से करता था)।
हस्तांतरित विषय: स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य आदि। (इन पर शासन गवर्नर भारतीय मंत्रियों की सलाह से करता था)।
द्विसदनात्मक विधायिका: केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका स्थापित की गई। अर्थात् केंद्रीय विधान परिषद का स्थान राज्य परिषद (उच्च सदन) एवं विधान सभा (निम्न सदन) वाले द्विसदनात्मक विधानमण्डल ने ले लिया।
सदस्यों की संख्या:
राज्य परिषद: सदस्यों की संख्या 60 थी, जिसमें 34 निर्वाचित एवं 26 मनोनीत होते थे तथा उनका कार्यकाल 5 वर्ष का था।
केंद्रीय विधान सभा: 144 सदस्य थे, जिसमें 104 निर्वाचित एवं 40 मनोनीत होते थे। उनका कार्यकाल 3 वर्ष का था। दोनों की शक्तियाँ समान थीं किंतु, बजट पर स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार केवल विधान सभा को था।
लोक सेवा आयोग का गठन: इस अधिनियम ने एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया। सिविल सेवकों की भर्ती के लिए 1926 ई. में केंद्रीय लोक सेवा आयोग (CPSC) का गठन किया गया।
बजट पृथक्करण: पहली बार केंद्रीय बजट को राज्यों के बजट से अलग कर दिया गया तथा राज्य विधानसभाओं को अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया गया।
वैधानिक आयोग: इसके अंतर्गत एक वैधानिक आयोग के गठन का प्रावधान किया गया, जिसका कार्य अधिनियम लागू होने के 10 वर्षों बाद जाँच करके अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था।
6. साइमन आयोग (Simon Commission - 1927)
गठन: नवंबर, 1927 में ब्रिटिश सरकार द्वारा सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक सात सदस्यीय वैधानिक आयोग का गठन किया गया, जिसका कार्य भारत शासन अधिनियम, 1919 के क्रियान्वयन की जाँच करना था।
विरोध: इस आयोग में सभी सदस्य अंग्रेज थे। अतः अधिकांश भारतीयों द्वारा इसका विरोध किया गया।
रिपोर्ट (1930): आयोग द्वारा वर्ष 1930 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई, जिसकी प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित थीं—
प्रांतों में द्वैध-शासन को समाप्त कर उन्हें स्वायत्तता प्रदान करना।
राज्यों में सरकारों का विस्तार किया जाना।
सशक्त संघ की स्थापना करना।
सांप्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था को जारी रखा जाए।
नेहरू रिपोर्ट (1928): साइमन रिपोर्ट में प्रांतों में उत्तरदायी शासन लागू करने तथा बर्मा को भारत से पृथक करने जैसी महत्वपूर्ण सिफारिशें शामिल थीं। यही साइमन रिपोर्ट आगे चलकर 1935 के भारतीय संविधान अधिनियम का आधार बनी।
7. नेहरू समिति के सदस्य एवं भारत शासन अधिनियम, 1935
नेहरू समिति के सदस्य:
सदस्य दल
1.मोतीलाल नेहरू (अध्यक्ष) कांग्रेस
2.सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस
3.जवाहरलाल नेहरू (सचिव) कांग्रेस
4.सर सैयद अली इमाम मुस्लिम लीग
5.शोएब कुरैशी मुस्लिम लीग
6.एम.एस. अणे हिन्दू महासभा
7.एम.आर. जयकर हिन्दू महासभा
8.जी.आर. प्रधान हरिजन
9.सरदार मंगल सिंह सिख
10.तेज बहादुर सप्रू उदारवादी
11.एम.एन. जोशी श्रमिक संघ
8. भारत शासन अधिनियम, 1935 (Government of India Act, 1935)
यह अधिनियम भारत में पूर्ण उत्तरदायी सरकार के गठन में एक मील का पत्थर साबित हुआ। यह एक लंबा और विस्तृत दस्तावेज था, जिसमें 321 धाराएं एवं 10 अनुसूचियाँ थीं।
मुख्य बिंदु:
अखिल भारतीय संघ की स्थापना: केंद्र एवं राज्य इकाइयों के बीच तीन सूचियों (संघीय सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची) के माध्यम से शक्तियों का बंटवारा। अवशिष्ट विषयों पर विधि बनाने का अधिकार वायसराय को दिया गया।
प्रांतों में द्वैध शासन की समाप्ति: प्रांतों में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई।
केंद्र में द्वैध शासन प्रणाली प्रारंभ: संघीय विषयों का स्थानांतरित एवं आरक्षित विषयों के रूप में विभाजन हुआ।
द्विसदनीय व्यवस्था: 11 राज्यों में से 6 में द्विसदनीय व्यवस्था (बंगाल, बंबई, मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रांत और असम) का प्रारंभ हुआ।
सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार: दलित जातियों, महिलाओं और मजदूर वर्ग के लिए प्रथम बार निर्वाचन की व्यवस्था की गई।
रिजर्व बैंक की स्थापना: देश की मुद्रा एवं साख नियंत्रण के उद्देश्य से।
संघीय न्यायालय का प्रावधान: इसके तहत 1937 ई. में संघीय न्यायालय की स्थापना हुई। इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वेयर थे।
प्रतिक्रिया: 1935 अधिनियम के बारे में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था— "यह अनेक ब्रेक वाली इंजन रहित गाड़ी है" तथा जिन्ना ने इसे "पूर्णतः सड़ा और मूल रूप से बुरा" कहा था।
9. क्रिप्स मिशन, 1942 (Cripps Mission)
आगमन: 22 मार्च, 1942 को क्रिप्स मिशन भारत आया। यह एक सदस्यीय आयोग था, जो सर स्टेफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार द्वारा भेजा गया था।
प्रस्ताव: द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद भारत का संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा की स्थापना की जाएगी, जिसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांतों एवं देशी रियासतों दोनों के प्रतिनिधि सम्मिलित होंगे।
अस्वीकार करने के कारण: महात्मा गांधी द्वारा इस प्रस्ताव को "दिवालिया बैंक द्वारा भविष्य की तिथि में भुनाने वाला चेक" (Post Dated Cheque) कहा गया।
10. वेवेल योजना एवं शिमला सम्मेलन, 1945
वेवेल योजना:
यूरोप में विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जापान के विरुद्ध भारतीय समर्थन प्राप्त करने तथा भारत में संवैधानिक गतिरोध को समाप्त करने के लिए 4 जून, 1945 को भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल ने जिस योजना की घोषणा की, उसे वेवेल योजना के नाम से जाना जाता है।
उद्देश्य: वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन करना, जिसमें वायसराय और सैन्य प्रमुख को छोड़कर शेष सभी सदस्य भारतीय होंगे। परिषद में सवर्ण हिंदुओं और मुस्लिमों को समान प्रतिनिधित्व मिलेगा।
शिमला सम्मेलन (1945):
शिमला सम्मेलन 25 जून, 1945 ई. को हुआ था। यह शिमला में होने वाला एक सर्वदलीय सम्मेलन था, जिसमें कुल 22 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस प्रतिनिधिमण्डल का नेतृत्व अबुल कलाम आजाद ने किया था।
विफलता: मुस्लिम लीग द्वारा यह शर्त रखी गई कि वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त होने वाले सभी मुस्लिम सदस्यों का चयन वह स्वयं करेगी। कांग्रेस इस प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार नहीं थी क्योंकि इससे कांग्रेस केवल गैर-मुस्लिमों का नेतृत्व करने वाली संस्था के रूप में रह जाती। अंततः शिमला सम्मेलन असफल हो गया।
11. कैबिनेट मिशन, 1946 (Cabinet Mission, 1946)
सदस्य: ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर क्लीमेंट एटली ने 22 जनवरी, 1946 को भारत में एक उच्च स्तरीय कैबिनेट मिशन भेजने का निर्णय लिया। इसके सदस्य थे:
- सर स्टेफोर्ड क्रिप्स
- ए.बी. अलेक्जेंडर
- सर पैथिक लॉरेंस (अध्यक्ष)
मुख्य प्रावधान:
ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों को मिलाकर एक अखिल भारतीय संघ का गठन किया जाएगा।
भारतीय संविधान के निर्माण के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के आधार पर एक संविधान सभा की स्थापना की जाएगी। इसमें कुल 389 सदस्य होंगे (292 ब्रिटिश प्रांतों के, 93 देशी रियासतों के और 4 चीफ कमिश्नरों के)।
लगभग 10 लाख व्यक्तियों पर संविधान सभा में एक सदस्य का प्रतिनिधित्व होगा।
संविधान सभा में महिला सदस्यों की संख्या 15, अनुसूचित जाति के सदस्यों की संख्या 26 तथा अनुसूचित जनजाति के सदस्यों की संख्या 33 थी।
12. अंतरिम सरकार का गठन (1946)
24 अगस्त, 1946 को पंडित नेहरू के नेतृत्व में भारत की पहली अंतरिम राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया। 26 अक्टूबर, 1946 को मुस्लिम लीग भी सरकार में शामिल हो गई।
अंतरिम सरकार (वर्ष 1946) के सदस्य और धारित विभाग:
सदस्य विभाग
1.जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रमंडल संबंध तथा विदेशी मामले
2.सरदार वल्लभभाई पटेल गृह, सूचना एवं प्रसारण
3.डॉ. राजेंद्र प्रसाद खाद्य एवं कृषि
4.जॉन मथाई उद्योग एवं नागरिक आपूर्ति
5.जगजीवन राम श्रम
6.सरदार बलदेव सिंह रक्षा
7.सी.एच. भाभा। कार्य, खनन एवं ऊर्जा
8.लियाकत अली खाँ वित्त
9.अब्दुर-रब-नश्तार डाक एवं वायु
10.सी. राजगोपालाचारी शिक्षा एवं कला
11.आई. आई. चुंदरीगर वाणिज्य
12.गजनफर अली खान स्वास्थ्य
13.जोगेंद्रनाथ मंडलविधि
14.आसफ अली रेलवे एवं परिवहन
डॉ. अंबेडकर का कथन: अंतरिम सरकार के संबंध में डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि, "यह एक देश की सरकार है जिसे दो राष्ट्र चला रहे हैं।"
13. माउंटबेटन योजना एवं स्वतंत्रता अधिनियम, 1947
माउंटबेटन योजना (3 जून, 1947):
तत्कालीन परिस्थितियों में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने 20 फरवरी, 1947 को यह घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार 30 जून, 1948 से पहले भारतीयों को सत्ता सौंप देगी। वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय बनाकर भेजा गया।
3 जून, 1947 को माउंटबेटन द्वारा प्रस्तुत योजना को माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan) कहा जाता है।
प्रमुख बिंदु: भारत का विभाजन भारतीय संघ और पाकिस्तान में कर दिया जाए।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947:
माउंटबेटन योजना के अनुसार, यह अधिनियम 4 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया गया, जो 18 जुलाई, 1947 को स्वीकृत हो गया।
प्रावधान:
15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र अधिराज्यों की स्थापना हो जाएगी।
दोनों देशों के लिए अलग-अलग संविधान सभा का गठन किया जाएगा।
स्वतंत्र भारत का पहला मंत्रिमंडल (1947 ई.):
सदस्य धारित विभाग
1.पं. जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री, राष्ट्रमंडल तथा विदेशी मामले, वैज्ञानिक शोध
2.सरदार वल्लभभाई पटेल गृह, सूचना एवं प्रसारण, राज्यों के मामले
3.डॉ. राजेंद्र प्रसाद खाद्य एवं कृषि
4.मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा
5.डॉ. जॉन मथाई रेलवे एवं परिवहन
6.आर. के. षणमुखम शेट्टी वित्त
7.डॉ. बी.आर. अंबेडकर विधि
8.जगजीवन राम श्रम
9.सरदार बलदेव सिंह रक्षा
10.राजकुमारी अमृत कौर स्वास्थ्य
11.सी.एच. भाभा वाणिज्य
12.रफी अहमद किदवई संचार
13.डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उद्योग एवं आपूर्ति
14.वी.एन. गाडगिल कार्य, खान एवं ऊर्जा
📌 संविधान सभा:
संविधान सभा के विचार को व्यावहारिक रूप में सर्वप्रथम अमेरिका और फ्रांस में अपनाया गया। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात संविधान सभा द्वारा ही भारत का संविधान बनाकर तैयार किया गया।

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